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प॒प्राथ॒ क्षां महि॒ दंसो॒ व्यु१॒॑र्वीमुप॒ द्यामृ॒ष्वो बृ॒हदि॑न्द्र स्तभायः। अधा॑रयो॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे प्र॒त्ने मा॒तरा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

paprātha kṣām mahi daṁso vy urvīm upa dyām ṛṣvo bṛhad indra stabhāyaḥ | adhārayo rodasī devaputre pratne mātarā yahvī ṛtasya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प॒प्राथ॑। क्षाम्। महि॑। दंसः॑। वि। उ॒र्वीम्। उप॑। द्याम्। ऋ॒ष्वः। बृ॒हत्। इ॒न्द्र॒। स्त॒भा॒यः॒। अधा॑रयः। रोद॑सी॒ इति॑। दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे। प्र॒त्ने इति॑। मा॒तरा॑। य॒ह्वी इति॑। ऋ॒तस्य॑ ॥७॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:17» मन्त्र:7 | अष्टक:4» अध्याय:6» वर्ग:2» मन्त्र:2 | मण्डल:6» अनुवाक:2» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश ऐश्वर्य्य करनेवाले ! जैसे सूर्य्य (महि) बड़े (दंसः) कर्म्म को (उर्वीम्) विस्तृत (क्षाम्) भूमि को और (द्याम्) प्रकाश को (वि, उप, पप्राथ) विशेष कर समीप में पूरित करता है और (ऋष्वः) बड़ा महात्मा जन (बृहत्) बड़े को (स्तभाय) स्तम्भित करता है, वैसे आप पूरित कीजिये और जैसे यह सूर्य्य (ऋतस्य) सत्य कारण के समीप से प्रकट हुए (देवपुत्रे) विद्वानों के पुत्र के समान वर्त्तमान (प्रत्ने) प्राचीन (मातरा) माता के सदृश आदर करनेवाले (यह्वी) बड़े (रोदसी) भूमि और सूर्य्य लोक को धारण करता है, वैसे आप (अधारयः) धारण करते हो ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य भूगोलों को धारण करके पिता के सदृश सम्पूर्ण प्रजाओं का पालन करता है, वैसे ही आप लोग यहाँ वर्त्ताव करो ॥७॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे इन्द्र ! यथा सूर्य्यो महि दंस उर्वी क्षां द्याञ्च व्युप पप्राथ ऋष्वः सन् बृहत् स्तभायस्तथा त्वं प्राहि यथायं सूर्य्य ऋतस्य जाते देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी रोदसी धारयति तथा त्वमधारयः ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पप्राथ) प्राति पूरयति (क्षाम्) भूमिम् (महि) महत् (दंसः) कर्म्म (वि) (उर्वीम्) विस्तृताम् (उप) (द्याम्) प्रकाशम् (ऋष्वः) महान् (बृहत्) (इन्द्र) सूर्य इवैश्वर्य्यकारक (स्तभायः) स्तभ्नाति (अधारयः) धारयसि (रोदसी) भूमिसूर्य्यलोकौ (देवपुत्रे) देवानां विदुषां पुत्र इव वर्त्तमाने (प्रत्ने) पुरातन्यौ (मातरा) मातृवन्मान्यकर्त्र्यौ (यह्वी) महत्यौ (ऋतस्य) सत्यस्य कारणस्य सकाशात् ॥७॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथा सूर्य्यो भूगोलान् धृत्वा पितृवत्सर्वाः प्रजाः पालयति तथैव यूयमत्र वर्त्तध्वम् ॥७॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जसा सूर्य भूगोलांना धारण करून पित्याप्रमाणे संपूर्ण प्रजेचे पालन करतो तसे तुम्ही लोक वागा. ॥ ७ ॥